गुलामी हमारे खुन में है।



आलेख का शीर्षक पढ़कर आपको लग रहा होगा कि, कैसा उटपटांग सा टाइटल है ,लेकिन जब आप पूरा आर्टिकल गहराई से पढेंगे तो आप भी इस शीर्षक से इत्तेफाक रखने लगेंगें। कैदी जब लंबा वक्त कैदखाने मे बीताता है तो वह उस जगह और वातावरण का आदी हो जाता है, फिर खुली जगह पर उसे अच्छा नहीं लगता , उसी तरह जब सदियों से या पीढी दर पीढी कोई दासता शिकार रहा हो, तो उसकी आनेवाली पीढी अनुवांशिक गुलाम हो जाती है।
ये अनुवांशिकता जिनेटिक नहीं बल्कि मनोवैज्ञानिक होती है। भारतीय संसकृति का इतिहास अगर आप टटोलेंगे तो उसमे आपको काफी अनिश्चितता मिलेंगी । मध्ययुगीन इतिहास काफी परिपक्व है पर उसकी सटीकता जरा संदेह (उस समय के इतिहास में आपको काफी अतिश्योक्ति मिलेगी। ) होता है। सटीकता के पचड़े में ना पड़ते हुए अगर आप मध्ययुगीन और आधुनिक इतिहास अध्ययन गहनता से करेंगें , तो पता चलेगा कि , हमने सदियों तक गुलामी सही है। पहले राजाओं की फिर मुगल शासकों की और बाद में अँग्रेजों की, अब आलम ये है कि, हम आजाद तो हो गए पर मन आज भी गुलाम है। 
पहले (राजाओं,मुगलों और अँग्रेजों)की गुलामी और आजकी  (राजनेताओं) गुलामी में कोई फर्क नही है, बस नाम और सिस्टम बदल गया हैऔर गुलामी हक़िकतमें आज भी वही है। एक कैदी अगर कहे कि , मैं आजाद हूँ, तो  इस मानसिकता से वो खुद तो संतुष्ट हो सकता है पर असलियत में अगर देखा जाए तो वो गुलाम ही तो है। यही हाल हम लोगों का भी है। 15 ऑगस्ट 1947मे देश को आज़ादी तो मिल गई पर हक़िकत में हम आज़ादहो गए क्या ? इस सवाल का जवाब मेरे से बेहतर शायद आपके पास हो।कुछतो ये राजनैतिक व्यवस्था ने हमें गुलाम बना रखा है , कुछ हमारी अनुवांशिक गुलामी भी इसकी जिम्मेदार है।  लोकतंत्र और स्वतंत्रता की दुहाई तो सब लोग देतें हैं, पर आम आदमी के हाथ में कौन सा अधिकार है । ( एक चुनाव का अधिकार अगर छोड़ दिया जाए ) संविधान ने तो आम आदमी को सारे अधिकार दे रखे हैं , लेकिन ये इस देश की विडंबना है कि, यहाँ आम आदमी को अपने अधिकार के बारे में पता ही नहीं होता  संविधान स्कूलों में पढ़ाया ही नहीं जाता , नागरिकशास्त्र के नाम पर सतही जानकारी देकर केवल खानापुर्ति की जाती है। 
देश गुंगा है, यहां का कानून अंधा है, और यहाँ की प्रशासनिक व्यवस्था बहरी है फिर भी यहाँ सभी लोग कहतें हैं , मेरा भारत महान, वो देश महान कैसे हो सकता है? जहाँ आज़ादी के 60 साल बाद भी भुखमरी है, महामारी है, शिक्षा का अभाव है, जागरुकता शून्य है, और दासता की प्रथा आज भी समाज में कायम है।
लोग रिश्वत इस हक से मांगते हैं तो लगता है कि, लोकमान तिलक का वो नारा "स्वराज मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है "? आज कहीं गलत साबित हो रहा है उसे आज  समाज ने बदल कर रख दिया है आज वो नारा बन गया है रिश्वत मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है।  पुलिस स्टेशन में सिपाही कंप्लेन नही लिखता , सरकारी अस्पतालें में मरीज़ों को ठीक से दवा नहीं मिलती , सरकारी दफ्तरों में सभी दस्तावेज होने के बावजुद भी काम नहीं होता ,सरकारी स्कूलों में बच्चों को शिक्षा नही मिलती। 
अनुवाशिक गुलामों में एक दोष सामान्यतः पाया जाता हैकि, वो कभी आज़ाद होना नहीं चाहते, क्योंकि उनमें मानसिक गुलामी घर कर चुकी होती है। इसके अलावा उनकी गुलामी मानसिकता आज़ादी वाली मानसिकता पर हावी हो चुकी होती है। इसका जीता जागता उदाहरण आपको अपने भीतर ही मिल जाएगा, बाहर मेहनत कर ढुढ़ने की जरुरत ही नहीं पड़ेगी, जैसै - जो काम बिना रिश्वत भी हो सकता है,हम वहाँभी रिश्वत दे ही देते हैं। कारण, कौन सरकारी दफ्तरो के चक्कर काटेगा ? नौकरी से छुट्टी कहाँ मिलती है? इत्यादी बहानों के जरिए । 
सब बात छोडिए आप बताइए जिस देश में लोग भगवान तक को रिश्वत देतें हैं, उस देश से भ्रष्टाचार भला कैसे खत्म हो सकता है?
एक किसान जिसने चंद हजार रुपए ही कर्ज लिए हैं वो न चुका पाने पर आत्महत्या करता है पर सहारा चिट फंड, शारदा चिट फंड किंगफिशर एयरलाइंस इत्यादी के बडे लुटेरे आत्महत्या नहीं करते, क्यों ?क्योंकि इन्हे पता है कि, सिस्टम इनका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता। यहीं गुलामी मानसिकता काम करती है क्योंकि इन लोगों के लिए संविधान में लिखे कानून को तोड़ मरोड़ दिया जाता है। पर आम आदमी.....................
संविधान में कहीं भी नहीं लिखा है कि, ये आम और खास लोगों के लिए अलग अलग है पर हकिकत में ये अलग अलग ही है। आज़ादी के बाद से हमारे हालाद और बिगड़े ही है जबकी हालाद में सुधार आना चाहिए था क्योंकि तकनीक बढ़ी है और हमें उसका फायदा मिलना चाहिए था । हम बेहतर होने के बजाए और कमजोर पड़ें हैं ।
राजा, मुगल शासक और अँग्रेज़ -आज के नेता 
जमींदार -बैंक वाले
शासकों के सितमग़र -सरकारी अफसर 
ज़ुल्मी सैनिक -पुलिस वाले
लगान -सरकारी टैक्स 
देश का मुनाफा, जो सासक देश लूट जाता था -मल्टीनैशनल कंपनियाँ
नाम बदल गए हैं पर आज भी हो वही रहा है, जो सदियों से चला आ रहा है। इस गुलामी मानसिकता से बाहर निकलना होगा , क्योंकिआज अगर हम इस बेड़ी को नहीं तोड़ेंगें, तो हमारा आने वाला कल आज़ाद नहीं हो पाएगा। इसके लिए इंतज़ार किसी और का नहीं शुरुवात हमें और आपको ही करना है, मैंने तो आग़ाज़ कर दिया है क्या आप इसके लिए तैयार हैं ???

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