कोख़ में सुलगती ज़िन्दगी


 
सरलता में महानता कठिन और दुर्लभ होती है, लेकिन माँ के चरित्र में ये दोनों सहजता से एक साथ दिखाई देता है .......स्त्रियों  का जीवन कई परीक्षाओं से भरा होता है हर परीक्षा में सफल होना आवश्यक है वर्ना एक या अनेक सामाजिक कलंक उन पर थोप दिया जाना लाजमी है ......पत्नी माँ बहन बहु और बेटी ये सभी रिश्ते बड़ी ही नाज़ुक डोर से बंधे होते हैं ...हमारा सामाजिक ढांचा कई बार इन रिश्तों को कमजोर करने में अपना पूरा हक़ अदा करता है और धर्म के पाखंडी इस पर बड़ी बेरहमी से अपने स्वार्थ कि रोटियाँ सकतें हैं ..... पुरुष प्रधानता को कन्या भ्रूण हत्या के लिए एक मात्र दोषी नहीं समझा जा सकता ......स्त्री और समाज के ढाँचे का भी उसमे बराबर का योगदान है ....प्राचीन समय से स्वार्थ और लोभ हमारे समाज का अभिन्न अंग है ये स्वार्थ और लोभ का ही उदहारण है कि जब गाय ये भैंस को बछिया पैदा होती है तो घर में ख़ुशी का माहौल हो जाता है और जब घर में लड़की पैदा होतो मातम छा जाता है......ये भी विडम्बना ही है कि सबसे ज्यादा दुखी जननी ही होती है उसका दुखी होना स्वाभाविक भी है , क्योंकि वो ये समझ रही होती है कि एक स्त्री होने के नाते जो दंश जीवन भर उसने सहें है मानो उसने वो सभी दंश सहने के लिए एक और अबला को अपने ही कोख़ से जन्म दे कर मानो अपने पाप को दुगुना कर दिया हो .......
अ) आख़िरकार  एक औरत होकर औरत ही ये क्यों सोचती है कि उसे बेटी नहीं जनना है......

१) औरतों पर समाज में होने वाले अत्याचार ......(अत्याचार चाहे किसी भी रूप में चाहे स्त्री उसे सहजता से कबूल भी कर ले पर अत्याचार के साथ उसके अटूट रिश्ते को समाज का कोई भी अंग नाकार  नहीं सकता एक माँ , बहन बेटी , भावज और बहु पर आए दिन होते अत्याचार से हम अनभिज्ञ नहीं हैं  )

२)दूर दराज इलाके आज भी स्त्री शिक्षा का आभाव......... (शिक्षा के आभाव के कारण ही उनका शोषण किया जाता है उन्हें अपना हक़ और अधिकार कि जानकारी बेहद ही कम होती है जिसके विरुद्ध वो आवाज़ नहीं उठा पाती हैं )

३) लड़कियों के प्रति पुरे समाज का नजरिया .........(हमारे समाज का नजरिया ही स्त्रिओं के प्रति कुछ ऐसा हो गया है कि पढ़े लिखे घर के लोग भी लड़की पैदा होने अनपढ़ लोगो जैसी मानसिकता का शिकार हो जाते हैं.....एक स्त्री को ही लड़की पैदा होने का जिम्मेदार समझा जाता है जबकि विज्ञान का कहना है कि पैदा होने वाला बच्चा लड़का होगा या लड़की इसका जिम्मेदार पूरी तरह शुक्राणु विसर्जित करने वाला पुरुष ही होता है  )

कन्या भ्रूण  ह्त्या के जो आंकड़े हमारे सामने आते हैं (केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसआ॓) की एक रपट में कहा गया है कि साल 2001-05 के बीच करीब 6,82,000 कन्या भ्रूण की हत्या हुई है अर्थात इन चार सालों में रोजाना 1800 से 1900 कन्या भ्रूण की हत्या हुई है।

रपट के मुताबिक 1981 में 0-6 साल के बच्चों का लिंग अनुपात 1981 में 962 था जो 1991 में घटकर 945 हो गया और 2001 में यह 927 रह गया है। इसका श्रेय मुख्य तौर पर देश के कुछ भागों में हुई कन्या भ्रूणकी हत्या को जाता है।
 
उल्लेखनीय  भारत सरकार ने 2011-12 तक बच्चों का लिंग अनुपात 935 और 2016-17 तक इसे बढ़ा कर 950 करने लक्ष्य रखा है। देश के 328 जिलों में बच्चों का लिंग अनुपात 950 से कम है ) ........नए कानून बना कर उसे नहीं रोका जा सकता क्योंकि भारत में एक कहावत है कि कानून तो बनता  ही टूटने के लिए है ........(1995 में बने जन्म पूर्व नैदानिक अधिनियम :प्री नेटल डायग्नास्टिक एक्ट, 1995 के मुताबिक बच्चे के लिंग का पता लगाना गैर कानूनी है जबकि इसका उल्लंघन सबसे अधिक होता है)

ब) सामाजिक ढांचे में जो स्त्रियों का प्रारूप तैयार किया गया है उससे कभी भी स्त्रयां खुश नहीं रही हैं और ऐसा नहीं है कि वो इसके खिलाफ आवाज़ नहीं उठती इतिहास गवाह है वक़्त वक़्त पर आवाज़ उठाई गई पर उन्हें इसी समाज ने दबा दिया एक उदहारण आपको बताना लाजमी समझता हूँ कि मिडिया भी इस मुद्दे को उत्नाएँ हवा नहीं देता जितने का ये मुद्दा  हकदार है......राजस्थान में एक बालिका ने अपनी उम्र से पहले शादी का विरोध किया मीडिया का रुझान उस ओर नहीं गया वो तो बस मसाला खबरों के पीछे ही भागती नज़र आती है मिडिया कि जो ताकत है उसका अंदाज़ा आज मिडिया को नहीं है वो क्रांति ला सकती आज़ादी के समय मिडिया का ये विकराल रूप नहीं था पर उस समय मिडिया कर्मियों के अन्दर वो जूनून था जो अब नज़र नहीं आता जबकि उसी तरह के क्रांतिकारी कि जरुरत हर समय हर समाज में होती है बस तब लोग अपने स्वार्थ से ऊपर देश को समझते थे और अब अपने स्वार्थ के आगे देश और समाजिक कलंक को मिटाने कि भावनाओं को तुच्छ समझा जाता है .......
आख़िरकार बेटी पैदा होने पर हगर वाले क्यों डरते है उसके भी कई कारण हैं

१) बेटी को ब्याने कि समस्या और खर्च 

२)अगर बेटी बदचलन निकाल जाए तो समाजिक बदनामी का डर 

३)शादी के बाद बच्चा न जन पाए तो बाँझ होने का कलंक 

४)अगर बेटी अपांग पैदा हुई तो जीवन भर का शाप 

५) बेटी यदि कुरूप है तो और बड़ी जहमत

६) ससुराल में ठीक माहोल न मिले तो जीवन भर का दंश और मामला यदि तलाक तक पहुंचे तो कोर्ट कचहरी और पारिवारिक बदनामी अलग

७) ज्यादा पढ़ लिख जाए या नक्षत्री हो तो भी शादी में अड़चन

इन सब का हल क्यों न उसे कोख़ में ही मौत कि नींद न सुला दिया जाए ....निरंतर लड़कियां  पैदा होते रहने पर भी घर के एक वरिश का इन्जार घोर अन्धकार ......प्राचीन समय में स्वयंवर भी भी यही दर्शाता है तब भी लड़कियों कि संख्या कम थी क्या तब भी भ्रूण हत्या होती अब इस विषय पर बहस करने का कोई तुक नहीं बनता लेकिन ये बात तो तय है कि लडके और लड़की का जो आज का आंकड़ा है (२०११ जन सांख्यिकी का ) उसे देखकर तो ये कहना ग़लत नहीं होगा कि जो प्रकृति के संतुलन के साथ हम खिलवाड़ कर रहे हैं उसका खामियाजा हमें और हमारी आने वाली पीढ़ी को भुगतना पड़ेगा ........

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